बप्पा रावल - गुहिल राजपूत वंश के कुलगौरव
बप्पा रावल से पुर्व चित्तौड़ पर मान मोरी या मौर्य राजपूतो का शासन था। इसी समय राजस्थान पर अरबों का आक्रमण हुआ।।राजा मान ने अपने सामंतों को विदेशी सेना का मुकाबला करने को कहा किंतु उन्होंने इनकार कर दिया। अंत मे बाप्पा रावल ने इस चुनौती को स्वीकार किया और हजारों घुड़सवारों का दल(बप्पा के नेतृत्व में कई राजपूत वँश जैसे गुहिलोत, राष्ट्रकूट, प्रतिहारों के गुट )अरबों पर धावा बोलने के लिए निकल पड़े ।। बप्पा के अद्भुत पराक्रम के सामने विदेशी आक्रमणकारी टिक नही पाए और सिंध की तरफ भाग निकले। शत्रुओं का पीछा करते हुए बप्पा गजनी तक पहुंच गया। गजनी के शासक सलीम को हराकर बप्पा ने अपने भांजे को वहाँ के सिंहासन पर बैठाया।।
734 ई में बप्पा ने चित्तौड़ पर आक्रमण करके अधिकार कर लिया।।अधिकार करके तीन उपाधियां धारण की-"हिंदुआ सूरज" "राजगुरू""चक्कवै(चक्रवर्ती)"।।
50 वर्ष की आयु में बप्पा ने खुरासान(मध्य एशिया) पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया।।
बप्पा ने अपने पूर्वजों की भांति सोने के सिक्कों का प्रचलन किया जो उसकी प्रतिभा और वैभव का प्रतीक था। 115 ग्रेन के सिक्के के दोनों तरफ कामधेनु, बछड़ा,शिवलिंग, नंदी,दंडवत पुरूष, नदी,मछली त्रिशूल आदि का अंकन है।।
इतिहासकारो ने "चार्ल्स मार्टेल"(मुगल सेनाओं को सर्वप्रथम पराजित करने वाला फ्रांसीसी सेनापति) की तुलना "बप्पा रावल" से की है(क्योंकि बप्पा ने सबसे पहले विदेशी अरबों को हराया)। इतिहासकार सी वी वैद्य के अनुसार उसकी शौर्य की चट्टान के सामने अरब आक्रमण के ज्वार-भाटा टकराकर चूर-चूर हो गया।
उसने इसफ़न,हान(प. चीन),कंधार,कश्मीर, इराक, ईरान,तुरान,काफ़रिस्तान आदि पश्चिमी देशों के शासकों को हराया ओर उन सब की पुत्रियों के साथ विवाह किया।।
बप्पा के सैन्य ठिकाने के कारण ही पाकिस्तान के शहर का नाम रावलपिंडी पड़ा।।


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