कुंवर अजित सिंह बीदावत (राठौड़) - बीदासर
#कुंवर_अजीतसिंह_बीदावत (राठौड़)
अजीतसिंह जी का जन्म सन् 1758 में हुआ था। अजीतसिंह के पिता का नाम जालमसिंह तथा माता का नाम छोटी ठकुरानी सोनगिरीजी था। अजीतसिंह का जन्म बीदावत राठौड़ों के ठिकाने गढ़ बीदासर में हुआ था। .
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. *कुंवर अजीतसिंह का द्वन्द्व युद्ध सन् 1773 में भट्टी मुसलमानों ने बीकानेर रियासत में विद्रोह कर दिया था, तब बीकानेर के महाराजा गजसिंह उनका दमन करने गए। उनके साथ बीदासर सेना के साथ कुंवर उम्मेदसिंह बीदावत तथा कुंवर अजीतसिंह बीदावत भी गए थे। जब युद्ध मैदान में आमने-सामने दोनों पक्ष पड़ाव किए हुए थे, तो भट्टियों की ओर से एक मुसलमान कमेत प्रतिदिन घोड़े पर आता और रोज एक बीकानेर का सैनिक मारकर सकुशल लौट जाता। इस प्रकार बीकानेर की सेना में भय व्याप्त हो गया। एक दिन कुंवर अजीतसिंह बीदावत ने उस मुसलमान कमेत का सामना करके उसका द्वन्द्व युद्ध में वध कर दिया। बीकानेर महाराजा गजसिंह ने इस पर उम्मेदसिंह को और अजीतसिंह को बुलाकर सम्मानित किया और उसके बाद में हुसैन खां भट्टी ने महाराजा की सेवा और अधीनता स्वीकार कर ली। .
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. *गौ माता की रक्षार्थ - कुंवर अजीतसिंह का वीरगति को प्राप्त होना 😗 सन् 1782 में बीकानेर रियासत में राठ मुसलमान बहुत ही लूटपाट करते थे। एक दिन राठ मुसलमानों का गिरोह मूमासर गांव आया और गांव की गायों को घेरकर ले गया। बीदासर ठिकाने के कुंवर अजीतसिंह बीदावत को जब यह बात पता चली तो उन्होंने अपनी प्रिय घोड़ी अलबख पर चांदी की काठी कराई और बैजासर ठिकाने के अपने मित्र घड़सिंहोत बीका और दो सांखला राजपूत परमा और सरूपा तथा एक ढोली को साथ में लेकर गायों को बचाने चल पड़े। रास्ते में ढोली तो बहाना बनाकर चलते बना और बैजासर ठिकाने पहुंचने पर उस घडसिंहोत बीका राजपूत के दो भाई भी कुंवर अजीतसिंह के साथ शामिल हो गए। आगे जाने पर गांव कोडीसर के दयालदासोत बीदावत तथा गंगाराम लाड्खानी शेखावत भी अजीतसिंह के साथ हो गए। कुंवर अजीतसिंह और उनका सैनिक दस्ता जैसे ही राठ मुसलमानों के गिरोह के पास पहुंचा, तो उन्होंने मुसलमानों पर हमला बोल दिया, बैजासर ठिकाने के बीका राजपूत युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए, लेकिन उन्होंने मुसलमानों के चंगुल से कुछ गायें छुड़वा ली। उसके बाद कुंवर अजीतसिंह बीदावत ने दूसरा धावा बोलकर सभी गायों को छुड़वा लिया और कुंवर अजीतसिंह के साथ आए राजपूत बंधुओं ने उनको वापस ठिकाने की ओर लौटने के लिए कहा, Part 2 -- परन्तु उन्होंने अपने मित्र घड़सिंहोत बीका राजपूत की मृत्यु हो जाने के कारण स्वयं जीवित लौटना अनैतिक समझा और युद्ध को अग्रसर रखा।
मुस्लिम गिरोह अजीतसिंह बीदावत पर वार नहीं करना चाहता था, क्योंकि इससे बैर बंध जाने का भय था। परंतु कुंवर अजीतसिंह बीदावत ने राठ मुसलमानों के गिरोह के मुखिया गेडा के सिर पर तलवार मारी, तब मुस्लिम लुटेरों ने अजीतसिंह को घेरकर घोड़ी के तंग काट डाले और कुंवर अजीतसिंह घोड़ी से गिर गए और राठ मुसलमानों ने अजीतसिंह पर कई गहरे घाव कर दिए। फिर भी अजीतसिंह बीदावत ने खड़े होकर युद्ध मैदान में भंयकर मार-काट मचा दी और फिर किसी मुस्लिम लुटेरे ने अजीतसिंह बीदावत को भाला मार दिया, वह भाला अजीतसिंह के शरीर के आर-पार निकल गया था। कुंवर अजीतसिंह के साथ तीन बीका राजपूत काम आए और लाड्खानी शेखावत गंगाराम ने भी मुसलमानों से भयंकर युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए। बहुत से लुटेरे मारे गए और जो थोड़े बहुत बचे वह कुंवर अजीतसिंह की घोड़ी ले गए।
बैजासर ठिकाने के चरवाहे पीछे दौड़े आ रहे थे, उन्होंने कुंवर अजीतसिंह को पानी पिलाया और शरीर से भाला निकाला, भाला निकालते ही अजीतसिंह वीरगति को प्राप्त हो गए। गांव बैजासर के राजपूत बंधु, युद्ध में शहीद हुए वीरों के पार्थिव शरीर को बैजासर के कुंए के पास लाए और दाह संस्कार कर वहां उनकी याद में चबूतरा बनवाया। .
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राठ मुस्लिम लूटेरों ने कुंवर अजीतसिंह की घोड़ी और जेवर ले लिए थे, यह सूचना नौहर के ठाकुर को मिलने पर उन्होंने राठ मुसलमानों के गिरोह को खत्म कर, घोड़ी और जेवर बीदासर भिजवाये। .
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इस घटना के समय बीदासर के ठाकुर जालमसिंह और पाटवी कुंवर उम्मेदसिंह राज सेवा में चुरू गए हुए थे। .
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बीकानेर महाराजा गजसिंह ने इस घटना पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि कुंवर अजीतसिंह हमारे देश के कारण काम आया है और कुंवर अजीतसिंह के पुत्र मोहब्बतसिंह का सम्मान करना चाहा, परंतु मोहब्बतसिंह की बाल्यावस्था के कारण ठाकुर जालमसिंह को मिलने फरमाकर राजकीय सम्मान किया गया और मोहब्बतसिंह को चरला की जागीर प्रदान की गई। ....
अजीतसिंह को जुझारों में शामिल कर भोमियाजी के रूप में पूजा जाने लगा। मूमासर के पूर्व में अजी ताणा तालाब और बीदासर छत्रोया के उत्तर में अजीत सागर कुंआ, अजीतसिंह की स्मृति स्वरूप बनवाये गये ।
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मुस्लिम गिरोह अजीतसिंह बीदावत पर वार नहीं करना चाहता था, क्योंकि इससे बैर बंध जाने का भय था। परंतु कुंवर अजीतसिंह बीदावत ने राठ मुसलमानों के गिरोह के मुखिया गेडा के सिर पर तलवार मारी, तब मुस्लिम लुटेरों ने अजीतसिंह को घेरकर घोड़ी के तंग काट डाले और कुंवर अजीतसिंह घोड़ी से गिर गए और राठ मुसलमानों ने अजीतसिंह पर कई गहरे घाव कर दिए। फिर भी अजीतसिंह बीदावत ने खड़े होकर युद्ध मैदान में भंयकर मार-काट मचा दी और फिर किसी मुस्लिम लुटेरे ने अजीतसिंह बीदावत को भाला मार दिया, वह भाला अजीतसिंह के शरीर के आर-पार निकल गया था। कुंवर अजीतसिंह के साथ तीन बीका राजपूत काम आए और लाड्खानी शेखावत गंगाराम ने भी मुसलमानों से भयंकर युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए। बहुत से लुटेरे मारे गए और जो थोड़े बहुत बचे वह कुंवर अजीतसिंह की घोड़ी ले गए।
बैजासर ठिकाने के चरवाहे पीछे दौड़े आ रहे थे, उन्होंने कुंवर अजीतसिंह को पानी पिलाया और शरीर से भाला निकाला, भाला निकालते ही अजीतसिंह वीरगति को प्राप्त हो गए। गांव बैजासर के राजपूत बंधु, युद्ध में शहीद हुए वीरों के पार्थिव शरीर को बैजासर के कुंए के पास लाए और दाह संस्कार कर वहां उनकी याद में चबूतरा बनवाया। .
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राठ मुस्लिम लूटेरों ने कुंवर अजीतसिंह की घोड़ी और जेवर ले लिए थे, यह सूचना नौहर के ठाकुर को मिलने पर उन्होंने राठ मुसलमानों के गिरोह को खत्म कर, घोड़ी और जेवर बीदासर भिजवाये। .
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इस घटना के समय बीदासर के ठाकुर जालमसिंह और पाटवी कुंवर उम्मेदसिंह राज सेवा में चुरू गए हुए थे। .
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बीकानेर महाराजा गजसिंह ने इस घटना पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि कुंवर अजीतसिंह हमारे देश के कारण काम आया है और कुंवर अजीतसिंह के पुत्र मोहब्बतसिंह का सम्मान करना चाहा, परंतु मोहब्बतसिंह की बाल्यावस्था के कारण ठाकुर जालमसिंह को मिलने फरमाकर राजकीय सम्मान किया गया और मोहब्बतसिंह को चरला की जागीर प्रदान की गई। ....
अजीतसिंह को जुझारों में शामिल कर भोमियाजी के रूप में पूजा जाने लगा। मूमासर के पूर्व में अजी ताणा तालाब और बीदासर छत्रोया के उत्तर में अजीत सागर कुंआ, अजीतसिंह की स्मृति स्वरूप बनवाये गये ।
जय मारवाड़🚩
जय राजपुताना



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